मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।
वो चश्मे पानी के, वो हरे पत्ते पौंधों के ,
क्या ये सब बेमानी हैं?
मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।
सपने देखना भी जुर्म हैं यहाँ,
बस आंखों में पानी हैं ।
होठों ने जो बोल सजाये थे,
वो तो अब बस एक दूंधली कहानी हैं।
मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।
ये जो पागल पवन बह रही हैं,
शायद फ़िर आंधी को आनी हैं।
रेत पर चलते साए को,
फ़िर अपनी मुहँ छुपानी हैं।
मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।
काफिले चलते रहेंगे यहाँ,
मिटते रहेंगे क़दमों के भी निशाँ।
दिखती रहेंगी मृग-त्रिश्नाये,
मगर चलते राही को, रोके कौन कहाँ।
मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।
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