बेचैन-सी रहती है अब ज़िंदगी,
साँसें भी मध्यम-मध्यम हैं।
हँसी जो लबों पर राज करती थी,
अब तो बस क़ैदी-सी लगती है।
कुसूर किसका था, सज़ा किसको मिली?
कौन दगा दे गया दोस्त बनकर?
प्रश्न कुछ ऐसे हो चुके हैं अब,
जिन्हें सुलझाने की कोई चाहत नहीं।
अक्स अपना डराता है अब,
ख़्वाहिश कोई बाक़ी नहीं रही।
अपना कौन है इस दुनिया में?
कौन अब मुझको पुकारता है?
यादें ही अब बस हर जगह रह गई हैं।
डर-सा लगता है, सर पर कोई हाथ नहीं रहा
जिसमें हर ख़ुशी ढूंढते थे,
वो अब आवाज़ नहीं रही।
पलक के सामने घरौंदा जो हाथों से बनाया था,
बिखरता जा रहा है।
आस जिससे लगी रहती थी,
वो भरोसा हटता जा रहा है।
न जाने किसकी नज़र लग गई हमें,
दिल जो कभी साफ़ था,
उसमें अँधेरा भरता जा रहा है।
कोई शौक़ नहीं, कोई ख़्वाब—कोई आरज़ू नहीं रही।
तुम चले गए… सारी नींद लेकर।
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