Monday, 16 February 2009

मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं!!

मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।

वो चश्मे पानी के, वो हरे पत्ते पौंधों के ,
क्या ये सब बेमानी हैं?

मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।

सपने देखना भी जुर्म हैं यहाँ,
बस आंखों में पानी हैं ।
होठों ने जो बोल सजाये थे,
वो तो अब बस एक दूंधली कहानी हैं।

मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।

ये जो पागल पवन बह रही हैं,
शायद फ़िर आंधी को आनी हैं।
रेत पर चलते साए को,
फ़िर अपनी मुहँ छुपानी हैं।

मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।

काफिले चलते रहेंगे यहाँ,
मिटते रहेंगे क़दमों के भी निशाँ।
दिखती रहेंगी मृग-त्रिश्नाये,
मगर चलते राही को, रोके कौन कहाँ।

मरुस्थल सा जीवन, बस रेत की जवानी हैं।

Sunday, 15 February 2009

मधुर स्वप्न

क्या कभी तुमने कोई सपना देखा हैं?
और देखा हैं एक चेहरा,
गुनगुनाता हुआ, खिलखिलाता हुआ।
हल्के दबे पावों से,
तुम्हारे चेहरे के ठीक बगल में खड़ें होकर,
ललाट पर कोमल हाथ फेरते हुए,
और धीरे धीरे तुम्हारे कान के पास आकर,
एक गीत सुनाता हुआ।
जिसके धुन अभी तक तुम्हें याद हैं।
जिसके बोल अभी तक ताजे हैं।

हाँ याद करो,
शायद,
वो तुम्हारा प्रेमी था,
या कोई सच्चा दोस्त?
जिसकी बातों में
तुम अक्सर खो जाया करती थीं ।
जिसके चेहरे की किताब,
बिना उल्टे पढ़ लिया करती थीं।
और बांट लेती थीं सारे गम,
जिसमे वो डूबा रहता ।
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान,
उसके सूनेपन और ग़मों की थी रामवाण।
और तुम्हारी बतियाँ,
जो उसे बांधे रखती, सुबह, दोपहर, शाम।

उसके होठों पर शायद,
हरपल था तुम्हारा नाम।
जिसे लेने से वो घबराता, शर्माता,
फ़िर भी तुम पूछा करती उससे,
कौन हैं जो तुम्हारे ख्वाबों में आता हैं।
और वो चुपचाप खोल कर एक हंसी,
यूँ ही हंसने लगता,
शायद छुपाना चाहता हों,
यां
बताना चाहता हों की,
क्यूँ पूछती हो बार बार जब की तुम्हें पता हैं,
मेरे ख्वाबों के बारे में भी।
पर शायद तुम सुनना चाहती थीं,
उसके मुंह से अपना नाम ।

तभी नींद खुल जाती हैं,
सपना टूट जाता हैं।
मगर,
उनींदी आंखों में अभी तक छाया हैं
"स्वप्न का नशा" ।
उसके होंठ बरबस
रमने लगते हैं तुम्हारे नाम की माला ।
शायद वो भी आज सुनाना चाहता था,
वो जो बंद था आज तक,
होठों की चाहरदीवारी में।

चैन मिला था उसे और शायद तुम्हें भी,
जब एक सपना बन गया हकीकत यूँ ही।




प्रेयसी

बंद पलको के साए में,
तुलिका ह्रदय की, उकेरती हैं,
दूंधली सी, अस्पस्ट तस्वीर एक।

अतलस से सजी, अतर तन में लिए,
ख्वत काली कृष्णा में भरे।
बुलाती हैं मुझे, कर - कर के इशारे अनेक।

चंद्र बिन्दु सी लगा कर कूर्च में ,
केशपाश में सितारे लिए , कुवलय से पैर ।
बजती रुनझुन सी पायल उनमे ,
मुग्ध ताकते रहे, तेरे तासीर में खो कर विवेक।

पेशलता की मूरत वो मोहिनी सी,
बस गई हैं वो अब तो हमारे जज्बातों में ।
बेचैन रहता हें मन हर पल,
डूब कर तेरे उन मीठी बातों में।

एक मधुर स्वपन था जिसे उनींदी आँखों ने देखा ।
मगर भुलाये नहीं भूलती, उन आँखों की काजल की रेखा।

और क्या लिखूं , क्या कहूँ , तू कौन हैं, तू क्या हैं ।
मेरी जिंदगी की नाव की, तू ही तो पतवार हैं ।