Sunday, 15 February 2009

प्रेयसी

बंद पलको के साए में,
तुलिका ह्रदय की, उकेरती हैं,
दूंधली सी, अस्पस्ट तस्वीर एक।

अतलस से सजी, अतर तन में लिए,
ख्वत काली कृष्णा में भरे।
बुलाती हैं मुझे, कर - कर के इशारे अनेक।

चंद्र बिन्दु सी लगा कर कूर्च में ,
केशपाश में सितारे लिए , कुवलय से पैर ।
बजती रुनझुन सी पायल उनमे ,
मुग्ध ताकते रहे, तेरे तासीर में खो कर विवेक।

पेशलता की मूरत वो मोहिनी सी,
बस गई हैं वो अब तो हमारे जज्बातों में ।
बेचैन रहता हें मन हर पल,
डूब कर तेरे उन मीठी बातों में।

एक मधुर स्वपन था जिसे उनींदी आँखों ने देखा ।
मगर भुलाये नहीं भूलती, उन आँखों की काजल की रेखा।

और क्या लिखूं , क्या कहूँ , तू कौन हैं, तू क्या हैं ।
मेरी जिंदगी की नाव की, तू ही तो पतवार हैं ।









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